आप सभी जानते हैं कि अणुबमों से हिरोशिमा में ३००००० और नागासाकी में १५०००० लोगों की ह्त्या हुई। इस संख्या से एक आम कल्पना मिल सकती है। सम्बंधित हर एक व्यक्ति को अत्यंत शोक में दबा देने वाली इस घटना की सघनता से हमारी संवेदनाएं सुन्न हो जाती हैं। हम लोग जो इस त्रासदी के साक्षी थे, इतनी भयंकर तबाही होगी, इसकी कल्पना भी नही कर सकते थे। यह विनाश कल्पनातीत था। ............................
हिरोशिमा का कवि होते हुए भी यह कविता संग्रह पूरा करने में लगे ६ सालों में मैनें जो सुस्ती दिखाई, उसके लिए मैं शर्मिन्दा हूँ। अपनी प्रतिभा की कमी पर भी शर्मिन्दा हूँ। मैं इस घटना की यादों की अर्थहीन टिप्पणी करना नहीं चाहता था, बल्कि मूल भावनाओं को व्यक्त करना तथा लोगों के, मातृ-भूमि के, मानवता के सन्दर्भ में बदलने वाले इतिहास के परिप्रेक्ष्य में इन पीड़ित लोगों की वेदना के महत्व को रेखांकित करना चाहता था। मेरी नज़रों में मेरी यह अभिव्यक्ति पर्याप्त नही है। .......... (उपरोक्त पुस्तक का एक संग्रह )
.........संग्रह से साभार एक कविता ...........
हमारे पिता लौटा दो, हमारी माताएं लौटा दो,
हमारे बुज़ुर्ग लौटा दो, हमारे बच्चे लौटा दो।
हमारे अपने लौटा दो, मुझे ही मुझको लौटा दो।
जब तक इंसान, इंसान बन कर जी रहा है,
तब तक ही उन्हें
न खत्म हो सके, ऐसी शांति लौटा दो।
किताब की कीमत 75 रुपये है।

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