श्रीलंका के एक राष्ट्र-प्रमुख की ह्त्या, पड़ोसी भारत के एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री की हत्या, एक दूसरे श्रीलंकाई राष्ट्रपति की ह्त्या का प्रयास, दर्ज़नों राजनीतिक हत्याएं और आत्मघाती हमले, और हजारों की संख्या में नागरिकों और सैनिकों का नरसंहार -ये मानवीय क्षति उसकी छवि को दानवी सम्मोहन प्रदान करते हैं।
...............ओसामा बिन लादेन के आतंकवादियों द्वारा न्यूयार्क के ट्विन-टावर को उडाये जाने के बहुत पहले, प्रभाकरण श्रीलंका में वैसा ही, और लगभग उतना ही सांकेतिक हमला कर चुका था और कोलम्बो के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को ध्वस्त कर चुका था।
लेकिन इस सऊदी धर्मोन्मादी की तरह प्रभाकरण एक धनाढ्य परिवार में नहीं जन्मा था , न ही उसने अपने इन कृत्यों के लिए किसी दूसरे देश की धरती का सहारा लिया था। वह उसकी तरह धर्मोन्मादी भी नहीं था। अगर उसका कोई उन्माद था तो वह तमिल राष्ट्रवाद था।
................प्रभाकरण के साथ मेरी पहली और एकमात्र भेंट १९८५ की गर्मियों में हुई। इसे एक दूसरे तमिल संगठन से जुड़े व्यक्ति ने आयोजित किया था। प्रभाकरण दिल्ली के डिप्लोमैट होटल में रुका था। उन दिनों श्रीलंका के कई दूसरे उग्रवादी और राजनीतिज्ञ भी राजधानी में थे।
..............उससे विदा लेने से पहले मैंने पूछा कि क्या लिट्टे अपनी किसी कश्ती से मुझे उत्तरी श्रीलंका ले जा सकता है? वह कुछ देर तक मेरे प्रश्न पर गौर करता रहा और फ़िर बोला कि मेरे अनुरोध पर विचार किया जा सकता है।
....................जून १९९० में श्री लंका के ख़िलाफ़ लिट्टे के सैनिक-अभियान के दौरान मैं उत्तरी श्रीलंका का दौरा करने वाले सबसे पहले पत्रकारों में से एक था। तभी मुझे लिट्टे के हाथ में आए विशाल क्षेत्रों का एहसास हुआ था। पूरा क्षेत्र लिट्टे के कैडरों से भरा था। वे बहुत निश्चिंत और आश्वस्त दिखाई दे रहे थे। जब मैंने एक युवा गुरिल्ला से पूछा कि उसके हाथ में कौन सा हथियार है तो उसने पलट कर जवाब दिया, कि तुम क्यों जानना चाहते हो?
.............तो यह है लिट्टे। ....अगर नेता मरने का आदेश देता है तो उन्हें मरना है- यह पूछे बगैर कि क्यों? प्रश्न पूछने वालों के लिए लिट्टे में कोई जगह नही थी। उनका काम सिर्फ़ लड़ना और मरना था। इससे कोई फर्क नहीं पङता कि नेता का क्या आदेश है,वह हमेशा सही होता है,वह भगवान है।
यह उसी आदमी की कहानी है।
किताब का नाम है- एक अबूझ मस्तिष्क के भीतर और लेखक हैं- एम्.आर.नारायण स्वामी -हिन्दी अनुवाद -युगांक धीर
पेपरबैक एडिशन का मूल्य १५० रुपये है।
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