आज तक मैं दूसरों की जिंदगी पर आधारित कहानियाँ ही रचती आई थी , पर इस बार मैंने अपनी कहानी लिखने की जुर्रत की है। .........पर अपनी कहानी लिखते समय सबसे पहले तो मुझे अपनी कल्पना के पर ही क़तर कर एक ओर सरका देने पड़े, क्योंकि यहाँ तो निमित्त भी मैं ही थी और लक्ष्य भी मैं ही। ..............पर अपनी कहानी लिखते समय तो मुझे अपने को अपने से ही काटकर बिल्कुल अलग कर देना पड़ा। ...............अब इसमें कहाँ तक सफल हो सकी हूँ , इसके निर्णायक तो पाठक ही होंगे ...मुझे तो न इसका दावा है,न दर्प। ............बाद में तो मैं भी सोचने लगी कि मेरा और राजेंद्र का सम्बन्ध जितना निजता और अंतरंगता के दायरे में आता है, उससे कहीं अधिक लेखन के दायरे में आता है। लेखन के कारण ही हमने विवाह किया था ......हम पति-पत्नी बने थे। उससमय मुझे लगता था कि राजेंद्र से विवाह करते ही लेखन के लिए तो जैसे राजमार्ग खुल जायेगा और उस समय यही मेरा एकमात्र काम्य था। उससमय कैसे मैं यह भूल गई कि शादी करते ही मेरे व्यक्तित्व के दो हिस्से हो जायेंगे .....लेखक और पत्नी। ..................लेकिन मेरे व्यक्तित्व का पत्नी-रूप ? इस पर राजेंद्र निरंतर जो प्रहार करते रहे, उसका परिणाम तो मेरे लेखक ने ही भोगा। (पुस्तक के स्पष्टीकरण अध्याय से मन्नू भंडारी के शब्द)
इस किताब के पेपरबैक एडिशन का मूल्य ११० रूपये है। पहला संस्करण २००८ में प्रकाशित हुआ था,दूसरा २००९ में। पाठकों से इस किताब पर राय अपेक्षित है।
Friday, October 23, 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

1 comment:
बहुत अच्छे दोस्त। लगे रहिये। कुछ न कुछ तो होगा ही।
Post a Comment