Wednesday, October 07, 2009

१८५७ के स्वाधीनता संग्राम का एकमात्र आंखों देखा रोमांचक विवरण

"आँखों देखा ग़दर" माझा प्रवास-विष्णु भट्ट गोडसे का हिन्दी रूपांतरण है। उत्तर भारत की यात्रा पर निकले और अनजाने ग़दर की हलचलों में फंस गए एक मराठा ब्राम्हण की दास्ताँ - जिसे प्रसिद्द हिन्दी कथाकार अमृतलाल नागर ने प्रस्तुत किया है। पेपरबैक संस्करण का मूल्य रू.६५ है।

2 comments:

बलराम अग्रवाल said...

नि:संदेह पठनीय पुस्तक है। मैंने इसे 2007 में 1857 की 150वीं वर्षगाँठ मनाते हुए ऐसी ही कई अन्य पुस्तकों के साथ पढ़ा था।

Anup sethi said...

बंधु , एक प्रति, जितना जल्‍दी हो भेज दीजिए. और यह वेरिफिकेशन का झंझअ हटा दीजिए. इससे वक्‍त जाया होता है.