Wednesday, October 14, 2009

जिन्ना, जसवंत और विभाजन

नापसंद पार्टी अध्यक्ष को बदलने या किसी वरिष्ठ सदस्य को हटाने या विवादास्पद पुस्तकों पर ज्ञानप्रद बहसों की स्वस्थ परम्पराएं हिन्दुस्तान की बड़ी राजनैतिक पार्टियों ने अब तक विकसित नहीं की हैं। इसलिए विवाद उठने पर रामराज्य के धोबी की परम्परा पर चलते हुए कानाफूसी स्तर की खबरें मीडिया में लीक कर दी जाती हैं। लेकिन चूंकि प्राय: पार्टी अध्यक्ष मर्यादा पुरुषोत्तम या विदेह जनक नहीं होते और असहमति के पक्ष में सकारात्मक और लोकतांत्रिक दबाव बन पाना पार्टी की परम्पराएं लगभग असंभव बना देती हैं, इसीलिये भाजपा में अंतत: मतभिन्नता की सज़ा दल से निष्कासन है और पुस्तक का प्रतिबंधित किया जाना या बजरंगियों द्वारा जलाया जाना ही आम है। (मृणाल पाण्डे)
जसवंत सिंह की ताज़ा किताब "जिन्ना - भारत-विभाजन के आईने में" और स्वयं लेखक दोनों का हश्र भी इसका प्रमाण है। किताब की कीमत ५९५ रुपये है।

4 comments:

अजय कुमार said...

swagat aur shubhkamnayen

Dev said...

WiSh U VeRY HaPpY DiPaWaLi.......

ashish arvind mishra said...

Hi
this is Arvind Kumar Mishra from Lucknow

congratulation for your success

Anonymous said...

जय हो जय हो