सन 1956 में तिब्बत का दरवाजा विदेशियों के लिए लगभग बन्द हो चुका था और राजनैतिक कारणों से भारत के साथ तिब्बत का सम्पर्क भी लगभग टूट चुका था। उन्हीं दिनों बिना किसी तैयारी के, विमल दे घर से भागा और नेपाली तीर्थयात्रियों के एक दल में सम्मिलित हो ल्हासा तक जा पहुँचा। उस समय उनकी उम्र मात्र पन्द्रह वर्ष थी। ल्हासा में उसने तीर्थयात्रियों का दल छोड़ा, और वहाँ से अकेले ही कैलास ख़ंड की ओर कूच कर गया।
किताब का नाम है- “महातीर्थ के अंतिम यात्री” और इसके लेखक हैं- बिमल दे।
बिमल दे ने इस किताब को एक भिखमंगे की डायरी कहा है। उनके शब्दों में-“एक पुरानी साइकिल और जेब में मात्र अठारह रुपये लेकर मैं दुनिया की सैर करने निकला था। कलकत्ता से भू-पर्यटन के लिये निकला था सन 1967 में और एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका व आस्ट्रेलिया घूमकर स्वदेश लौटा था सन 1972 में। मित्र, संबंधी, रेडियो व प्रेस ने मुझे शाबाशी दी; किसी ने मुझे महान पर्यटक कहा, किसी ने मुझे साहसी अभियात्री, किंतु ऐसे लोग कम ही थे जो यह जानना चाहते थे कि इन पर्यटनों से मैंने क्या पाया?”
दिलीप कुमार बनर्जी के श्ब्दों में- “इस पुस्तक में जिस मौनी बाबा की सनसनीखेज यात्रा का वर्णन है, उसका जन्म कलकत्ता में होने पर भी वह भारतवासी नहीं, विश्ववासी है। धरती की दैनिक व वार्षिक गति के साथ तालमेल रखते हुए ही मानों बिमल दे भी घूमता रहा है, और अब भी घूम रहा है, पृथ्वी के चारों ओर। चीन, जापान, रूस, यूरोप, अमेरिका, आष्ट्रेलिया आदि देशों का वह निरंतर चक्कर लगा रहा है अब भी। तभी वह भू-पर्यटक है। भ्रमण ही उसका जीवन है, वह थमना नहीं जानता।
इस किताब की कीमत है- 275 रुपये।
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