दैहिक और मानसिक शोषण, अभिशप्त मातृत्व और भूख एवं लाचारी पर लिखी गई इस पुस्तक के माध्यम से एक ज्वलंत समस्या के प्रति देश के लोकमानस का ध्यान आकर्षित करवाने की कोशिश की गई है। किताब का नाम है – ये माताएँ अनब्याही
इस किताब में शामिल कुछ अध्यायों के नाम इस प्रकार हैं – अविवाहित माताओं की ओर से, उन इलाकों के बारे में, वास्तविक यथार्थ से ऐसे हुए रू-ब-रू, नागदंश से कहीं बड़ी पीड़ा, पिता से गए और जिंदगी से भी, कियावती एक घोषित गाँव-वधू, हेडमास्टर की हरमजदगी, जवानी आजमाने के काम आती देह, एक किलो गोश्त से भी सस्ती, फ्रॉक पहनने की उम्र में माँ बनने की उलझन, पाप-पुण्य के पसोपेश में पद्मा का प्रेम, जीजा ने भरी जिन्दगी में जलालत, दीदी तेरा देवर दगाबाज निकला, आदिवासी देह होने की पीड़ा, जिन्दगी की शाम की बाट जोहती सन्ध्या, गुनाहों की देवी कृष्णा टांडी, दलीलों की पेंच में फंसी प्रेम की दास्ताँ, पैसेवाले ने बनाया अनब्याही माँ, इश्क की दास्तां और जवानी की ज़ुबाँ,मतलब धोखा, माँ के प्रेमी ने बनाया माँ, पालतू पशुओं के लिए बन गई माँ, नग्न उत्सव के भयावह सच...........
इस किताब के लेखक हैं- डॉ.सुनीता शर्मा, अमरेन्द्र किशोर पेपरबैक एडिशन की कीमत 125 रुपये है।
Friday, November 27, 2009
ये माताएँ कहाँ करे गुहार
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1 comment:
यह बड़ा ही विचित्र सत्य है मानव जीवन का, कि उसने हर रिश्ते को बिकाऊ बना डाला है, बेटे या बेटी को पढ़ाते हैं तो किसलिए बस हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा, और तो और बीबी हो तो कमाऊ होनी चाहिए - है ना एक तीर से दो शिकार, विवाह के विज्ञापन में यही मिलेगा - खूब पढ़ी लिखी हो, एमबीए हो या आइटी रोजगार प्राप्त हो, फिर गृह कार्य में दक्ष हो खाना पकाने में निपुण हो, शुक्र है आज सिलाई कढ़ाई की बात नहीं की जाती है।
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