हिन्दी और अंग्रेजी में विज्ञान लेखन को लोकप्रिय बनाने वाले गुणाकर मुळे का 13 अक्टूबर को निधन हो गया। वह 74 वर्ष के थे। वे पिछले डेढ़-दो वर्षों से बीमार थे। उन्हें मांसपेशियों की एक दुर्लभ जेनेटिक बीमारी हो गई थी, जिससे उनका चलना-फिरना बन्द हो गया था।
1935 में विदर्भ के अमरावती जिले के सिंदी बुजुरुक गाँव में जन्मे मुळे की शुरुआती पढ़ाई गाँव के मराठी माध्यम में हुई। उन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर (गणित) की शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की। स्वतंत्र लेखन करने वाले गुणाकर मुळे ने 1958 से विज्ञान, विज्ञान का इतिहास, पुरातत्व, पुरालिपिशास्त्र, मुद्राशास्त्र और भारतीय इतिहास और संस्कृति से सम्बन्धित विषयों पर लेखन किया है। गुणाकर मुळे ने 35 पुस्तकों के अलावा हिन्दी में 3000 से अधिक लेख लिखे। जबकि अँग्रेजी में उनके 250 लेख प्र्काशित हो चुके हैं।
राहुल सांस्कृत्यायन से प्रभावित गुणाकर मुळे की लेखनी सही मायने में वैज्ञानिक विचारधारा प्रचारित करने वाली रही है। गुणाकर मुळे की पहचान विज्ञान के जटिल रहस्यों को सरलता से पहुँचाने साथ जटिलता के बहाने पनप रहे अंधविश्वासों को दूर करने में रही है। मुळे जी ने एक जगह लिखा है – “भारत की गंदगी को साफ करने के लिए आपको यथासंभव भारतीय झाड़ू का ही उपयोग करना चाहिए। प्राचीन भारतीय साहित्य में बुद्धिवादी चिंतन का विशाल भण्डार मौजूद है। आवश्यकता है तो सिर्फ उसे खोजने और उसका समुचित उपयोग करने का।“
एक दूसरी जगह वह लिखते हैं – “प्रचार किया जाता है कि प्राचीन भारतीय चिंतन परम्परा प्रमुखत: आध्यात्मवादी रही है। आज कई टी.वी. चैनलों से प्रसारित होने वाले धार्मिक कार्यक्रम इसी भ्रामक धारणा को फैलाने में जुटे हुए हैं लेकिन सच्चाई यह है कि ठेठ वैदिक काल से भारत में भौतिकवादी और बुद्धिवादी चिंतन की प्रबल धारा सतत प्रभावित होती रही है।“ - अनन्या ओझा –साभार-जनसमाचार
गुणाकर मुळे का प्रमुख साहित्य
ब्रह्मांड परिचय, संसार के महान गणितज्ञ, आकाश दर्शन, सूर्य, सौर मण्डल, नक्षत्र लोक, अंतरिक्ष यात्रा, भारतीय विग़ान की कहानी, भारतीय लिपियों की कहानी, भारतीय अंकपद्धति की कहानी, अंकों की कहानी, अक्षरों की कहानी, ज़्यामिति की कहानी, महान वैज्ञानिक, आधुनिक भारत के महान वैज्ञानिक, प्राचीन भारत के महान वैज्ञानिक, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, पास्कल, केपलर, आर्किमीडीज़, मेंडेलिफ, गणित की पहेलियां, आपेक्षिकता-सिद्धांत क्या है(मूल लेखक-लेव लांदाऊ,यूरी रुमेर –अनुवाद/परिशिष्ट-गुणाकर मुळे)
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